शहर के क़िस्से

संकट हिफ़ाज़त मुक्ति

जगन्नाथ पांडा

अनटाइटल्ड, 2007 कैनवस पर एक्रिलिक और फ़ाइबर 

रात के अँधेरे में डूबे हुए शहर में रिहाइशी इमारतों की एक कतार, जिनके आगे खड़ा है अनोखे ढंग से रोशन एक पेड़ – जगन्नाथ पांडा की यह विशाल, शीर्षकविहीन पेंटिंग दर्शकों को मुग्ध कर देती है.

वे अपनी कलाकृतियों में आंशिक रूप से चमकदार ज़री की सजावट का उपयोग करते हैं. इससे वे उस चीज़ की तरफ़ ध्यान खींचते हैं, जिसे हम जानबूझ कर अनदेखा कर दिया करते हैं. यहाँ सूखता हुआ पेड़ एक खूब सजे हुए, सुनहरे रेशम के कपड़े से सजाया गया है. वीरान परिवेश में दिशाहीन परिंदे बेचैनी से उड़ रहे हैं, जबकि हम देखते हैं कि उनींदे शहर में इंसानी वजूद का कोई निशान नहीं है.

इन परिंदों को अनहोनी की ख़बर देने वाले नायकों के रूप में पेश किया गया है, जबकि धुँधली, अंधेरे में डूबी या चमकदार खिड़कियाँ एक सपनीला माहौल रचती हैं.

यह कलाकृति एक ज़रूरी मुद्दे की तरफ़ ध्यान दिलाती है. यह उस संतुलन की बात करती है जो प्रकृति को होने वाले नुक़सान और भारी शहरीकरण के बीच बनता है. ज़्यादातर शहर इस तनावग्रस्त संतुलन को बनाए रखने के लिए जूझ रहे हैं. यह कलाकृति संकेत करती है कि कैसे प्रकृति के ख़िलाफ़ शहरी और औद्योगिक गतिविधियाँ इस संतुलन को संकट में डाल देती हैं.